इश्क़ पर ज़ोर नहीं है
ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे
और बुझाए न बने
अब तो है इश्क़-ए-बुताँ में
ज़िंदगानी का मज़ा
जब ख़ुदा का सामना होगा तो
देखा जाएगा
गुज़रे है
आज इश्क के उस मुकाम से,
नफरत सी हो गयी है मोहब्बत के
नाम से
इश्क चख लिया था इत्तफ़ाक से,
ज़बान पर आज भी दर्द के
छाले हैं.
तेरी बेवफाई का सौ बार शुक्रिया,
मेरी जान छूटी इश्क़-ऐ-बवाल से .
धुआँ धुआँ
सा लग रहा है शहर में
लगता है किसी का इश्क़ जल रहा है
ठंड में
ना कर तू इतनी कोशिशे,
मेरे दर्द को समझने की,
पहले इश्क़ कर, फिर चोट खा,
फिर लिख दवा मेरे दर्द की.
तेरी ख़ामोशी,
अगर तेरी मज़बूरी है, तो
रहने दे इश्क़ कौन सा जरुरी है.
इश्क़ के चर्चे भले ही सारी
दुनिया में होते होंगे,
पर दिल तो ख़ामोशी से ही
टूटते हैं
आपकी नशीली यादों में डूबकर,
हमने इश्क की गहराई
को समझा,
आप तो दे रहे थे धोखा और,
हमने जानकर भी कभी आपको
बेवफा न समझा.
सुनो ना
हमारे और तुम्हारे इश्क का
चर्चा है अब शहरो में.
कोई सुनता नही
अब लैला-मजनूँ की कहानी..
आरज़ू, अरमान,
इश्क़, तमन्ना, वफ़ा, मोहब्बत,
चीज़ें तो अच्छी है पर दाम बहुत है..
कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा
आदमी काम का नहीं होता
कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
खता ए इश्क़ नही देखता
महबूब पत्थर है या कोहिनूर है.
गर इश्क़-इश्क़ है तो हर हाल में
मंजूर है
वो अच्छे हैं तो बेहतर है
बुरे हैं तो भी कुबूल,
मिजाज-ए-इश्क में
ऐब-ओ-हुनर देखे
नहीं जाते
जिस ख्वाब में
हो जाए दीदारे नबी हासिल
ऐ इश्क़ कभी हमको भी
वो नींद सुला दे
फितूर होता है
हर उम्र में जुदा-जुदा,
खिलौना, इश्क़, पैसा, ख्याति फिर
खुदा-खुदा.
नजर , नमाज , नजरिया ,
सब कुछ बदल गया,
एक रोज इश्क़ हुआ , और
खुदा बदल गया.
बेहद बेकाबू इश्क मे
दर्द मिलना लाजमी है गालिब,
पर दर्द हद से गुजर जाये तो
दवा हो जाया करता है.
तेरे ख़त में इश्क की गवाही
आज भी है,
हर्फ़ धुंधले हो गए पर स्याही
आज भी है.
इधर आ रक़ीब मेरे,
मैं तुझे गले लगा लूँ
मेरा इश्क़ बे-मज़ा था,
तेरी दुश्मनी से पहले.
नमाज़ में भी
मेरी इश्क़ बाजियाँ ना गई,
पढ़ी फिर वहीं आयतें,
जिसमें,जिक्र-ए-सनम आया.
तफ़रीक़ हुस्न-ओ-इश्क़ के
अंदाज़ में न हो,
लफ़्ज़ों में फ़र्क़ हो मगर
आवाज़ में न हो.
इश्क वो खेल नहीं
जो छोटे दिल वाले खेलें
रूह तक काँप जाती है
सदमे सहते-सहते.
मेरे इबादत-ए-इश़्क की
कहानी ना पूछ मुझसे,
हर सांस ने हज़ारों बार
तेरा नाम लिया हैं
इश्क की राहों में
जिस दिल ने शोर मचा रखा था,
बेवफाई की गलियों से आज वो
खामोश निकला.
न तस्वीर है
आपकी जो दीदार किया जाये,
न आप पास हो, जो इश्क किया जाये,
ये कैसा दर्द दिया है, न कुछ कहा जाये
न कुछ सुना जाये.
अभी तो राख ही हुए है
तेरे इश्क में,
मेरे बिखरने का खेल तो
अभी बाकी है.
बरबाद कर देती है
मोहब्बत हर मोहब्बत करने वाले को,
क्यू कि इश्क़ हार नही मानता
और दिल बात नही मानता.
उस वक़्त तो
खुदा भी सोच में पड़ गया,
जब मैंने इश्क़ और सुकून दोनों
साथ में माँग लिया.
इश्क़ ने जब माँगा खुदा से
दर्द का हिसाब,
वो बोले हुस्न वाले ऐसे ही बेवफाई
किया करते हैं.
गिरते रहे सजदों में हम
अपनी ही हसरतों की खातिर
अगर इश्क़-ऐ खुदा में गिरे होते तो
कोई हसरत अधूरी ना होती.
ख़त्म हो गयी कहानी
बस कुछ अलफ़ाज़ बाकी हैं,
एक अधूरे इश्क की एक मुकम्मल सी
याद बाकी है
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
वो इस कमाल से खेले थे
इश्क की बाजी,
मैं अपनी फतह समझता रहा
मात होने तक
मत करवाना इश्क़ ए दस्तूर
हर किसी को ए खुदा,
हर किसी में जीते जी मरने की
ताक़त नही होती.
इंकार जैसी
लज्जत इक़रार में कहां.
बढ़ता रहा इश्क ग़ालिब,
उसकी नही-नही से
ये बात किसने उड़ाई की
मुझे इश्क है तुमसे,
हाँ, तुमको यकीं आये तो
अफवाह नही हैं ये.
इश्क़ इनायत है खुदा की,
तो मैं गुनाहगार कैसे?
पी लेने दो शराब
इस आशिक को,
लगता हैं ये भी इश्क में
चोट खाया हुआ है.
जो गुजरे इश्क में
सावन सुहाने, याद आते हैं
तेरी जुल्फों के मुझको
शामियाने याद आते हैं.
खेल और इश्क़
दोनों मुख़्तलिफ़ सी बातें हैं,
एक में तुम माहिर, एक में मैं माहिर.
इश्क महसूस करना भी
इबादत से कम नहीं,
ज़रा बताइये छू कर' खुदा को
किसने देखा है?
किस खत में रखकर भेजूं
अपने इन्तजार को
बेजुबां हैं इश्क़ ढूँढता हैं
खामोशी से तुझे.
मुक्कमल इश्क की
तलबगार नहीं हैं आँखें.
थोड़ा-थोडा ही सही,
रोज़ तेरे दीदार की चाहत है
चलते तो हैं
वो साथ मेरे, पर अंदाज देखिए,
जैसे की इश्क करके वो
एहसान कर रहें है
मत कर यूं बेपनाह इश्क,
ऐ नादां दिल उनसे,
बहुत जख़्म लगते हैं,
जब उँचाई से
गिरते हैं
गमगीन से
गमहीन होना चाहता हूँ
अब मैं खुद से इश्क़ करना चाहता हूँ
इश्क़ से क़ातिल
कोई नशा नहीं जनाब,
घूँट-घूँट पीते है और
कतरा कतरा मरते है
शायरी उसी के लबों पर
सजती है साहिब
जिसकी आँखों में
इश्क़ रोता हो
घुटन सी होने लगी है,
इश्क़ जताते हुए,
मैं खुद से रूठ जाता हूँ,
तुम्हे मनाते हुए
देखते हैं
अब क्या मुकाम आता है साहब,
सूखे पत्ते को इश्क हुआ है
बहती हवा से
हुस्न वाले
वफ़ा नहीं करते,
इश्क वाले दगा नहीं करते,
जुल्म करना तो इनकी आदत है,
ये किसी का भला नहीं करते
इश्क को भी इश्क हो तो
फिर मैं देखूं इश्क को भी,
कैसे तड़पे कैसे रोये,
इश्क अपने इश्क में
बढती उमर का इश्क
और ढलती उमर की ख्वाहिश
खूबसुरत जिस्म नही,
खूबसुरत साथ ढूंढता है
खता-मत-गिन
इश्क़ में
किसने क्या गुनाह किया
इश्क़ इक नशा था जो
तूने भी किया और मैंने भी किया
मत ज़िक्र करो
अपने अदा के बारे मे,
हम भी बहुत जानते हैं
वफ़ा के बारे मे,
हमने सुना हैं
उन्हे भी इश्क़ का नशा छाया हैं
जो नही जानते कुछ भी
वफ़ा के बारे मे.
इश्क मुहब्बत तो सब करते हैं,
गम-ऐ-जुदाई से सब डरते हैं,
हम तो न इश्क करते हैं न मुहब्बत,
हम तो बस आपकी एक मुस्कुराहट
पाने के लिए तरसते हैं ❗
हर धड़कन में
एक राज़ होता है,
हर बात कहने का एक अंदाज़ होता है.
जब तक ठोकर न लगे इश्क़ में,
हर किसी को अपने महबूब पे
नाज़ होता है.
इश्क ज़िस्मानी खेल बन के
रह गया,
पनघट किनारे इंतजार करने के
ज़माने चले गये.
किसे मालूम था
इश्क़ इस कदर लाचार करता है,
दिल उसे जानता है बेवफा है,
मगर प्यार करता है.
पहले इश्क
फिर धोखा फिर बेवफ़ाई,
बड़ी तरकीब से एक शख्स ने
तबाह किया.
इश्क से बचिए जनाब,
सुना है धीमी मौत है ये.
न मौत आती है
न कोई दवा लगती है,
न जाने उसने
इश्क में कौन सा जहर
मिलाया था.
ले रहे थे मोहब्बत के बाजार मे
इश्क की चादर,
पीछे से आवाज आयी कफन भी ले लो
जरूरत पड़ेगी..
कल लगी थी
शहर में बद्दुआओं की महफ़िल
मेरी बारी आई तो मैंने कहा
इसे भी इश्क़ हो इसे भी इश्क़
इसे भी इश्क़ हो.
अजब जज्बा है इश्क़ करने का
उम्र जीने की है और
शौक मरने का.
आज तो बे-सबब उदास है जी
इश्क़ होता तो कोई बात भी थी
जाने कब उतरेगा कर्ज उसकी
मोहब्बत का
हर रोज आँसुओं से इश्क की
किस्ते भरता हूँ
अपने जख्मों की
नुमाइश करना एक इक अदा है
दुनियां को पता तो चले,
यह मशहूर इश्क आखिर क्या बला है.
अगर इश्क़ हुआ दोबारा,
तो भी तुझसे ही
होगा,
मेरे नादान दिल को तुझ पर इतना
भरोसा है..
अदायें सीख लीं
तुमनें,नज़र से क़त्ल करने की,
मगर तालीम न सीखी, किसी से
इश्क़ करने की.
ऐ 'ख़ुदा'
तू कभी इश्क न करना
बेमौत मारा जायेगा,
हम तो मर के भी तेरे पास आते है
पर तू कहा जायेगा?
मत पूछो यारो
ये इश्क कैसा होता है,
बस जो रुलाता है ना
उसे ही गले लगाकर रोने को
जी चाहता है.
बड़ी काम आई लगन इश्क़ में,
मैं गिर-गिर के ख़ुद हि
संभलता रहा.
इश्क़-ऐ-बेवफ़ाई ने डाल दी है
आदत बुरी,
मैं भी शरीफ हुआ करता था
इस ज़माने में,
पहले दिन शुरू करता था मस्जिद में
नमाज़ से,
अब ढलती है शाम शराब के साथ
मैखाने में..
तेरे इश्क़ का सुरूर था.
जो खुद को बर्बाद कर लिया,
वर्ना. दुनियाँ मेरी भी दीवानी थी.
जाम तो
यू ही बदनाम है
यारों कभी इश्क करके देखो,
या तो पीना भूल जाओगे
या फिर पी-पी के जीना
भूल जाओगे.
अभी तो इश्क़ हुआ है,
मंज़िल तो मयखाने में मिलेगी.
ये इश्क भी नशा-ए-शराब
जैसा है, यारो
करें तो मर जाएँ और छोड़े तो
किधर जाएँ
कितना भी कर ले, चाँद से इश्क़,
रात के मुक़द्दर मे, अँधियारे ही
लिखे हैं
ये इश्क़ बनाने वाले की मैं
तारीफ करता हूं,
मौत भी हो जाती है और कातिल भी
पकड़ा नही जाता.
ये रात ये तनहाई और
ये तेरी याद
मैं इश्क न करता तो
कब का सो गया होता
उस से कह दो के,
मेरी सजा कुछ कम कर दे,
हम पेसे से मुजरिम नहीं हैं,
बस गलती से इश्क हुआ है
कल क्या
खूब इश्क़ से मैने बदला लिया,
कागज़ पर लिखा इश्क़ और
उसे ज़ला दिया।
इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं,
चंद लम्हों में फ़ैसला न करो
चलते थे इस जहाँ में कभी.
सीना तान के हम,
ये कम्बख्त
इश्क़ क्या हुआ घुटनो पे
आ गए हम
जिंदा है तो बस
तेरी इश्क की रहमत पर,
हम मर गये तो समझना
तेरा प्यार कम पड गया.
फासले ही अच्छे है इश्क में यारों,
ज्यादा करीब रहने से मोहब्बत,
पाक नही रहती
इश्क में
सिर्फ दिल नहीं आता
अक्ल भी आती है बस ज़रा देर से