कुछ कहा भी नहीं और सारी बात हो गयी,
उसकी ख़ामोशी ने ही सारी दास्तान कह सुनाई।
जब से ये अक्ल जवान हो गयी,
तब से ख़ामोशी ही हमारी जुबान हो गयी।
जब से ग़मों ने हमारी जिंदगी में
अपनी दुनिया बसाई है,
दो ही साथी बचे हैं अपने
एक ख़ामोशी और दूसरी तन्हाई है।
मेरी खामोशियों पर भी उठ रहे थे सौ सवाल,
दो लफ्ज़ क्या बोले मुझे बेगैरत बना दिया।
शोर तो गुजरे लम्हे किया करते हैं जिंदगी में अक्सर,
वो तो आज भी हमारे पास से ख़ामोशी से गुजर जाते हैं।
हर जज़्बात कोरे कागज़ पर उतार दिया उसने,
वो खामोश भी रहा और सब कुछ कह गया।
जरूरी नहीं कि हर बात लफ़्ज़ों की गुलाम हो,
ख़ामोशी भी खुद में इक जुबान होती है।
इश्क की राहों में जिस दिल ने शोर मचा रखा था,
बेवफाई की गलियों से आज वो खामोश निकला।
उसकी सच्चाई जब से हमारे पास आई,
हमारे लबों को तब से ख़ामोशी ही रास आई।
हम खुश थे तो लोगों को शक भी न हुआ,
जरा सी ख़ामोशी ने हमारी सारे राज खोल दिए।
उसने पढ़े तो ही अल्फाजों ने बोलना शुरू किया,
वरना एक अरसे से ये पन्नों में खामोश पड़े थे।
कभी सावन के शोर ने मदहोश किया था मौसम,
आज पतझड़ में हर दरख़्त खामोश खड़ा है।
ये तुफान यूँ ही नहीं आया है
इससे पहले इसकी दस्तक भी आई थी,
ये मंजर जो दिख रहा है तेज आंधियों का
इससे पहले यहाँ एक ख़ामोशी भी छाई थी।
शोर तो दुनिया वालों ने मचाया है हमारे कारनामों का,
हमने तो जब भी कुछ किया ख़ामोशी से ही किया है।
हमारी ख़ामोशी ही हमारी कमजोरी बन गयी,
उन्हें कह न पाए दिल के जज़्बात और इस तरह से
उनसे इक दूरी बन गयी।
भूल गए हैं लफ्ज़ मेरे लबों का पता जैसे,
या फिर खामोशियों ने जहन में पहरा लगा रखा है।