Raat Shayari

watch_later Thursday, 7 November 2019
तेरे वादे को कभी झूट
नहीं समझूँगा
कल की रात भी दरवाज़ा
खुला रखूँगा

रातों में खूब बातें होतीं हैं खुद से,
कौन कहता है अकेला हूँ मैं.

रातों को रौशन होने वाले
अक्सर सूरज के आते ही चले जाया करते हैं

जलाकर हसरत की राह पर चिराग आरजू के,
हम तन्‍हा रातों में .. तेरे मिलने का इंतजार करते हैं

हर रात हमारे ख्वाब बदलते हैं,
मंजिल नहीं कारवां बदलता हैं,

रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
वसीम बरेलवी

रात भी नींद भी
कहानी भी
हाए क्या चीज़ है
जवानी भी❗

अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी
तिरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए

मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए
न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए

हम तो रात का मतलब समझें ख़्वाब, सितारे, चाँद, चराग़
आगे का अहवाल वो जाने जिस ने रात गुज़ारी हो

बरसात की भीगी रातों में
फिर कोई सुहानी
याद आई,
कुछ अपना ज़माना याद आया
कुछ उनकी जवानी
याद आई.

आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए
हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात

रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती

कितना भी कर ले, चाँद से इश्क़,
रात के मुक़द्दर मे, अँधियारे ही लिखे हैं

कल रात भर मैं ख्वाब में उसके
आगोश में रहा,
ख्वाब ही सही, मगर कुछ पल तो <मr>bैं उसका रहा.

आज की रात भी तन्हा ही कटी
आज के दिन भी अंधेरा होगा
अहमद नदीम क़ासमी

हर तरफ़ थी ख़ामोशी और ऐसी ख़ामोशी
रात अपने साए से हम भी डर के रोए थे

ये उदास शाम और तेरी ज़ालिम याद,
खुदा खैर करे अभी तो रात बाकि है.

मुद्दत से एक रात भी अपनी नहीं हुई
हर शाम कोई आया उठा ले गया मुझे.

मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तिरे पहलुओं से आँच आई

आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रौशन

आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रौशन

ये सर्द रात ये तन्हाईयाँ ये नींद का बोझ,
हम अपने शहर में होते तो घर गए होते.

रातों को जागते हैं इसी वास्ते कि
ख़्वाब, देखेगा बन्द आँखें तो
फिर लौट जायेगा

तेरी आँखों के ये जो प्याले हैं,
मेरी अंधेरी रातों के उजाले हैं,
पीता हूँ जाम पर जाम तेरे नाम का,
हम तो शराबी बे-शराब वाले हैं.

इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिन से एक रात

बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई

रात भी नींद भी कहानी भी
हाए क्या चीज़ है 👉 जवानी भी

रात इकाई नींद दुहाई,
ख्वाब सैकडा दर्द हजार❗

गर मेरी चाहतों के मुताबिक, जमाने में हर बात होती,
तो बस मैं होता वो होती, और सारी रात बरसात होती.

अह्दे-जवानी रो-रो काटी,पीरी में लीं आंखें मून्द
यानी रात बहुत थे जागे,सुबह हुई आराम किया

रात आ जाए तो फिर तुझ को पुकारूँ या-रब
मेरी आवाज़ उजाले में बिखर जाती है

बे- इख्तियार आँखों से आँसु छलक पड़े
कल रात अपने आप से जिस वक्त हम मिले

मुझसे नहीं कटती अब
ये उदास रातें
बेखुदी मे कल सूरज से कहूँगा
मुझे साथ लेकर डूबे

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई

रात को रात कह दिया मैं ने
सुनते ही बौखला गई दुनिया

हैरत से देखता हूँ हर इक नक्शे पा’ को मैं
दिन रात ढूँडता हूँ किसी दिलरुबा को मैं

कौन कहता है कि दिन रात मेरे नाम करो
एक लम्हा तो मिरे साथ गुजारा होता

सुना है दिन को उसे तितलियँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनु ठहर के देखते हैं

रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गई
ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर का

रात ही वो नेक दिल मां कि जिस की गोद में
हम सराहनो के तले मुँह को छुपा कर सो सकें

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई

था व'अदा शाम का मगर आए वो रात को
मैं भी किवाड़ खोलने फ़ौरन नहीं गया

रात भर जलता रहा ये दिल उसकी याद में
समझ नही आता दर्द प्यार करने से
होता है या याद करने से?

रात की खामोशी रास नहीं आती,
मेरी परछाईं भी अब मेरे पास नहीं आती

बात करनी थी, बात कौन करे
दर्द से दो-दो हाथ कौन करे
हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं
चाँद न हो तो रात कौन करे.

मौत का एक दिन मुअय्यन’ है
नींद क्यों रात नहीं आती
गालिब

मय से ग़रज़ नशात है किस
रू-सियाह को
इक-गूना बेख़ुदी मुझे
दिन रात चाहिए

दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
'अख़्तर' वो बेख़ुदी के ज़माने
किधर गए
अख़्तर शीरानी

न मुदारात हमारी न अदू से नफ़रत
न वफ़ा ही तुम्हें आई न जफ़ा ही आई
बेखुद बदायुनी

हमारे
ख़्वाब चोरी हो गए हैं
हमें रातों को नींद आती नहीं है❗
बख़्श लाइलपूरी

उस के बगैर नींद न आई तमाम रात
करवट बदल के बिताई तमाम रात
अख्तर हुसैन बख्तावर

इक सुब्ह है जो हुई नहीं है
इक रात है जो कटी नहीं है

रात भी नींद भी कहानी भी,
हाय क्या चीज है जवानी भी।
एक पैगामे-जिन्दगानी भी,
आशिकी मर्गे-नागहानी भी।।

अब आओ मिल के सो रहें
तकरार हो चुकी
आँखों में नींद भी है बहुत रात कम भी है❗
निज़ाम रामपुरी

कौन कहता है उसकी याद से
बे-खबर हूँ मैं,
मेरी आंखो से पूछ ले मेरी रात
कैसे गुजरती है.

शाम होते ही सज जाता है
तेरी याद का बाजार,
बस इसी रौनक से हमारी
सारी रात गुजर
जाती है.

फिर कभी न आऊँगी तुम्हारी
ज़िन्दगी में लौट के
सारी ज़िन्दगी तन्हाई के लिए ,
आज की रात बहुत है

रातो में घर का दरवाज़ा
खुला रखती हूँ,
काश कोई लुटेरा आये और मेरे
ग़मों को लुट ले जाए.

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई❗

हर तरफ़ फ़िर तो अन्धेरा होगा
रात जब दिन के उजाले को निगल जाएगी

रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती
इब्न-ए-इंशा

रोज़ रात 'रात' की तरह चले आते हो
अंधेरा और ख्वाब लिए

आँख और खाब में इक रात की दूरी रखना
ऐ-मुसव्विर मेरी तस्वीर अधूरी रखना

चाँद खिड़की से झाकेगा आदतन…,
चांदनी फिरसे दिल जलाएगी….
रात तनहा….सहर तक जाएगी

रेगिस्तान की झुलसती रात के
बारिश हो तुम
मेरा वजूद, मेरा ख्वाब,
मेरी ख्वाहिश
हो तुम ❗

पी के रात को हम उनको भुलाने लगे,
शराब में गम को मिलाने लगे,
दारू भी बेवफा निकली यारों,
नशे में तो वो और भी याद आने लगे..

उदास रात है
बीरान दिल की धड़कन है
ये बदनसीबी
मुझे लेकर कहां चली आयी ❓

आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए
हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात

रात आई है बलाओं से रिहाई देगी
अब न दीवार न ज़ंजीर दिखाई देगी

खींच कर उस माह रू को आज यां लाई है रात।
यह खुदा ने मुद्दतों में हमको दिखलाई है रात॥

खामोश शहर की चीखती रातें,
सब चुप है पर, कहने को है हजार बातें.

रात को आराम से हूँ मैं न दिन को चैन से,
हाए ऐ वहशते दिल, हाए हाए दर्द-ए-दिल.

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई
राही मासूम रज़ा

सोयी आँखों में हलचल करते रहे,
कल रात तुम्हारे ज़िद्दी ख़याल.

निगाह-ए-साक़ी से पैहम छलक रही है शराब,
पिओ की पीने-पिलाने की रात आई है.

खामोश शहर की चीखती रातें,
सब चुप है पर, कहने को है हजार बातें.

दिन ख़्वाब को पलकों पे सजाने में गुज़र जाय
रात आये तो नींदों को मनाने में गुज़र जाय

कैद है कुछ ख़्वाब इन खुली आँखों में,
न जाने कब जागती रातो का सवेरा होगा.

एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है
मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की

आ भी जाओ तसल्लियाँ दे दो
नासिर जौनपुरी
मशला रात का है खेर जाने दो.

जुगनू सहेज सकते हैं
बनना नहीं आता
किसी की रातों को रौशन
करना नहीं आता

जाम पे जाम पीने से क्या फायदा दोस्तों,
रात को पी हुयी शराब सुबह उतर जाएगी,
अरे पीना है तो दो बूंद बेवफा के पी के देख
सारी उमर नशे में गुज़र जाएगी ..

जूनून–ए–इश्क़ था,
तो कट जाती थी रात ख़्यालो में
सज़ा–ए–इश्क़ आई, तो
हर लम्हां सदियों सा लगने लगा

गिरी मिली एक बोतल शराब की, तो ऐसा लगा मुझे,
जैसे बिखरा पड़ा हो सुकून, किसी के एक रात का.

दो-चार बातें कर ली होती,
तनहा़ रात के कह़र ढानें से पहले,
हम यूं ना भीगते तकिये के गिलाफ़,
सुबह हो जाने से पहले..

मोहब्बत के सुहाने दिन
जवानी की हसीन
राते,
जुदाई में नज़र आती हैं
ये सब ख्वाब की
बाते.

खुशबू की तरह आया वो
तेज हवाओं में,
माँगा था जिसे हमने दिन-रात
दुआओं में.

बेचैन इस क़दर था, सोया न
रात भर.
पलकों से लिख रहा था, तेरा नाम
चाँद पर

वो कह के चले इतनी मुलाक़ात
बहुत है
मैंने कहा रुक जाओ अभी
रात बहुत है

पता है तुम्हें, मैं बहुत बातें करता हूँ,
तुम्हारी चाँद से,अक्सर रातों में.

मै रोता रहा रात भर मगर फैसला ना कर सका,
तू याद आ रही है, या मै याद कर रहा हूँ.



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