Matlabi Shayari

watch_later Sunday, 3 November 2019

गिरगिट बन बदले यहाँ, दुनिया कैसे रंग ।
करे उसी से दुश्मनी, जिससे रहता संग ।।
छुरा पीठ में घोंपती, गले लगाकर आज,
पैसों ने है कर दिया, मोह सभी का भंग ।

किसको अपना मान लें सभी पराये आज
मीठी बोली बोलते बैठे बीच समाज
सखा किसी को मानकर मत करना अभिमान
जिस पर अति विश्वास हो वही बिगाड़े काज।

मतलब से है मित्रता मतलब से है प्यार
मतलब से रिश्ते सभी मतलब का व्यवहार
अपनापन अब है नहीं झूठे हैं सब लोग
झूठे भावों का यहाँ सभी करें व्यापार।

मौका सभी तलाशते, दिन हो या फिर रात ।
मीठी भाषा बोलकर, मन की लेते बात ।।
सारे जग में पीट कर, उसी बात का ढोल,
हमको आज दिखा रहा, मानव अपनी जात ।

छोड़ गए अपने सभी आज हमारा साथ
कल तक जो कहते रहे हम थामेंगे हाथ
मानव सभी हैं स्वार्थी दिखा रहे औकात
संग न इनका कीजिए चाहें रहें अनाथ।

वही भरोसा तोड़ता, होती जिससे आस ।
स्वार्थपूर्ण संसार पर, रहा नहीं विश्वास ।।
किसने क्या तुमसे कहा, इसको जाओ भूल,
जीवन में आगे बढ़ें, करना यही प्रयास ।



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